वेनेजुएला संकट और भारत: ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीति पर प्रभाव
वेनेजुएला का राजनीतिक संकट केवल लैटिन अमेरिका तक सीमित नहीं है; इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार और भारत जैसे ऊर्जा-आयात करने वाले देशों पर पड़ता है। चूंकि भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वेनेजुएला में हो रही उथल-पुथल भारत के लिए सामरिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है।
इस संकट का भारत पर पड़ने वाले प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण :
1. कच्चा तेल और ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security)
वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है। भारत के लिए वेनेजुएला का तेल विशेष रूप से महत्वपूर्ण है:
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सस्ता ‘भारी’ तेल (Heavy Crude): वेनेजुएला का तेल ‘भारी’ (heavy and sour) होता है। भारत की कई रिफाइनरियां (जैसे रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी और नायरा एनर्जी) विशेष रूप से इसी तरह के भारी तेल को प्रोसेस करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। यह तेल अन्य विकल्पों की तुलना में सस्ता मिलता है, जिससे भारतीय कंपनियों का रिफाइनिंग मार्जिन बेहतर होता है।
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आयात में बाधा: अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण पिछले कुछ वर्षों में आयात रुका हुआ था। 2023 के अंत में जब अमेरिका ने थोड़ी ढील दी थी, तो रिलायंस और ONGC जैसी भारतीय कंपनियों ने तुरंत खरीदारी शुरू कर दी थी। लेकिन 2024 के चुनाव विवाद के बाद फिर से प्रतिबंध (Sanctions Snapback) लगने से भारत को तेल खरीदने के लिए विशेष अमेरिकी लाइसेंस पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
2. ONGC विदेश लिमिटेड (OVL) का फंसा हुआ पैसा
भारत की सरकारी कंपनी ‘ONGC विदेश लिमिटेड’ (OVL) का वेनेजुएला में बड़ा निवेश है (सैन क्रिस्टोबाल प्रोजेक्ट में 40% हिस्सेदारी)।
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600 मिलियन डॉलर का बकाया: राजनीतिक और आर्थिक संकट के कारण, वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी (PDVSA) भारत को लाभांश (dividend) का भुगतान नहीं कर पाई है। यह राशि लगभग $600 मिलियन (करीब 5000 करोड़ रुपये) से अधिक है।
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‘कैश के बदले तेल’ रणनीति: चूँकि वेनेजुएला के पास नकद पैसा नहीं है, भारत सरकार और OVL यह कोशिश कर रहे हैं कि वेनेजुएला अपने कर्ज के बदले भारत को कच्चा तेल दे। अमेरिका ने OVL को इस तरीके से अपना पैसा वापस लेने के लिए कुछ विशेष छूट (Waivers) दी हैं। मौजूदा संकट इस वसूली प्रक्रिया को धीमा या जटिल बना सकता है।
3. कूटनीतिक संतुलन (Diplomatic Balance)
भारत की विदेश नीति हमेशा “रणनीतिक स्वायत्तता” (Strategic Autonomy) की रही है।
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तटस्थ रुख: अमेरिका और पश्चिमी देश जहां मादुरो का कड़ा विरोध कर रहे हैं, वहीं भारत ने वेनेजुएला के आंतरिक मामलों में सीधे हस्तक्षेप करने या किसी पक्ष की कड़ी निंदा करने से परहेज किया है।
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भारत का हित: भारत का मुख्य उद्देश्य अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना और अपना फंसा हुआ पैसा वापस निकालना है। इसलिए, भारत मादुरो सरकार के साथ भी बातचीत के रास्ते खुले रखता है, भले ही वैश्विक मंच पर उनकी आलोचना हो रही हो।
4. वैश्विक तेल की कीमतें (Global Oil Prices)
वेनेजुएला का संकट अगर गृहयुद्ध या पूर्ण अराजकता में बदलता है, तो वैश्विक बाजार से एक बड़ा सप्लायर पूरी तरह गायब हो सकता है।
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हालांकि अभी अमेरिका और ब्राजील जैसे देशों ने उत्पादन बढ़ाया है, लेकिन अगर वेनेजुएला का उत्पादन ठप होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
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महंगा तेल सीधे तौर पर भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और मुद्रास्फीति (Inflation) को बढ़ा सकता है।
निष्कर्ष
भारत के लिए वेनेजुएला एक महत्वपूर्ण भागीदार है, लेकिन एक “जोखिम भरा” भी। भारत की प्राथमिकता वहां लोकतंत्र की बहाली से ज्यादा अपनी ऊर्जा सुरक्षा और निवेश की वापसी है। भारत बहुत ही सधे हुए कदमों से चल रहा है—वह अमेरिका को नाराज भी नहीं करना चाहता (ताकि प्रतिबंधों में छूट मिलती रहे) और वेनेजुएला से सस्ता तेल भी चाहता है।
