दिल्ली का दम घोंटता प्रदूषण: एक वार्षिक त्रासदी और समाधान की तलाश

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देश की राजधानी दिल्ली, जो अपनी ऐतिहासिक विरासत और राजनीतिक शक्ति के लिए जानी जाती है, पिछले कुछ दशकों से एक और, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण कारण से दुनिया भर में सुर्खियों में है—वह है यहाँ का ‘जहरीला प्रदूषण’। हर साल जैसे ही सर्दियाँ दस्तक देती हैं, दिल्ली और उसके आस-पास का (NCR) इलाका एक विशाल ‘गैस चैंबर’ में तब्दील हो जाता है। सुबह की शुरुआत ताजी हवा से नहीं, बल्कि आंखों में जलन और गले में खराश के साथ होती है। स्मॉग (धुंध और धुएं का मिश्रण) की एक मोटी, पीली चादर शहर को ढंक लेती है, जिससे सूरज की रोशनी भी धुंधली पड़ जाती है। यह स्थिति अब एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि एक गंभीर ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल’ (Public Health Emergency) बन चुकी है।

प्रदूषण के प्रमुख कारण: आखिर क्यों घुटता है दिल्ली का दम?

दिल्ली के प्रदूषण का कोई एक कारण नहीं है, बल्कि यह कई कारकों का एक जटिल मिश्रण है, जो सर्दियों में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण विकराल रूप ले लेता है:

  1. पड़ोसी राज्यों में पराली जलाना (Stubble Burning): यह अक्टूबर और नवंबर के महीनों में प्रदूषण के अचानक बढ़ने का सबसे बड़ा तात्कालिक कारण है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान धान की फसल कटने के बाद अगली फसल के लिए खेत तैयार करने की जल्दबाजी में फसल के अवशेष (पराली) जला देते हैं। इसका धुआँ हवाओं के साथ दिल्ली की ओर आता है और शहर को ढक लेता है।

  2. वाहनों का अथाह रेला: दिल्ली में वाहनों की संख्या करोड़ों में है। पुरानी डीजल गाड़ियां, ट्रक और ट्रैफिक जाम में फंसे लाखों दोपहिया और चार पहिया वाहन लगातार जहरीली गैसें (नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर) हवा में घोलते रहते हैं। यह साल भर चलने वाला प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत है।

  3. भौगोलिक स्थिति और मौसम (Weather and Geography): दिल्ली एक ‘लैंडलॉक्ड’ (चारों तरफ जमीन से घिरा) शहर है। सर्दियों में यहाँ हवा की गति बहुत धीमी हो जाती है और तापमान गिर जाता है। इस ‘इनवर्जन’ (inversion) की स्थिति में प्रदूषक तत्व वातावरण में ऊपर जाने के बजाय सतह के पास ही फंस जाते हैं, जिससे प्रदूषण का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है।

  4. निर्माण कार्यों की धूल और औद्योगिक इकाइयां: शहर में लगातार चल रहे निर्माण कार्य (मेट्रो, फ्लाईओवर, इमारतें) हवा में भारी मात्रा में धूल (PM 10) उड़ाते हैं। इसके अलावा, NCR के आसपास चल रही औद्योगिक इकाइयां भी प्रदूषण में योगदान देती हैं।

  5. कचरा और बायोमास जलाना: शहर के कई हिस्सों में अब भी खुले में कचरा या सर्दियों में ठंड से बचने के लिए लकड़ी/कोयला जलाया जाता है, जो स्थानीय स्तर पर हवा को जहरीला बनाता है।

प्रदूषण के घातक दुष्परिणाम

इस जहरीली हवा में सांस लेने की कीमत दिल्लीवासी अपनी सेहत से चुका रहे हैं:

  • स्वास्थ्य संकट: वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) का खतरनाक स्तर पर पहुंचना सीधे तौर पर फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है। अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, सांस लेने में तकलीफ और दिल की बीमारियों के मामले तेजी से बढ़े हैं। डॉक्टर इसे ‘धीमा जहर’ कहते हैं।

  • बच्चों और बुजुर्गों पर असर: सबसे बुरा असर बच्चों पर पड़ रहा है, जिनके फेफड़े अभी विकसित हो रहे हैं, और बुजुर्गों पर, जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। अक्सर प्रदूषण के कारण स्कूलों को बंद करना पड़ता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई का भी नुकसान होता है।

  • जीवन की गुणवत्ता में कमी: आंखों में जलन, सिरदर्द, थकान और चिड़चिड़ापन आम बात हो गई है। लोग घर से बाहर निकलने या पार्क में व्यायाम करने से डरने लगे हैं।

वर्तमान प्रयास और चुनौतियां

सरकार ‘ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान’ (GRAP) के तहत कई कदम उठाती है, जैसे—निर्माण कार्यों पर रोक लगाना, ट्रकों की एंट्री बंद करना, या कभी-कभी ‘ऑड-ईवन’ लागू करना। हवा साफ करने के लिए ‘स्मॉग टावर’ भी लगाए गए हैं।

लेकिन चुनौती यह है कि ये सभी कदम ज्यादातर ‘प्रतिक्रियात्मक’ (reactive) हैं, यानी संकट आने के बाद उठाए जाते हैं। पराली जलाने की समस्या का राजनीतिक और आर्थिक समाधान अभी तक पूरी तरह नहीं निकल पाया है। सार्वजनिक परिवहन (बस और मेट्रो) अभी भी इतनी मजबूत नहीं है कि लोग अपनी निजी गाड़ियां छोड़ दें।

समाधान की दिशा में कदम: आगे की राह

दिल्ली को इस संकट से उबारने के लिए टुकड़ों में नहीं, बल्कि एक व्यापक और दीर्घकालिक योजना की जरूरत है:

  1. सार्वजनिक परिवहन को सर्वोच्च प्राथमिकता: मेट्रो के नेटवर्क का विस्तार और विशेष रूप से बसों की संख्या और उनकी गुणवत्ता में भारी सुधार करना होगा ताकि लोग कार छोड़कर बस में सफर करने में गर्व महसूस करें। ‘लास्ट माइल कनेक्टिविटी’ को सुधारना होगा।

  2. पराली का आर्थिक विकल्प: किसानों पर सिर्फ जुर्माना लगाना काफी नहीं है। सरकारों को पराली के प्रबंधन के लिए मशीनें और उसके आर्थिक उपयोग (जैसे बायो-सीएनजी या खाद बनाना) के लिए सस्ता और आसान विकल्प देना होगा।

  3. इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को बढ़ावा: पेट्रोल-डीजल वाहनों को चरणबद्ध तरीके से हटाकर इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से बढ़ाना होगा।

  4. धूल प्रबंधन: निर्माण स्थलों पर धूल उड़ने से रोकने के नियमों का सख्ती से पालन और सड़कों की मशीनीकृत सफाई अनिवार्य करनी होगी।

  5. जनभागीदारी (Citizen Participation): यह लड़ाई सिर्फ सरकार नहीं जीत सकती। नागरिकों को भी जिम्मेदारी लेनी होगी—रेड लाइट पर गाड़ी बंद करना, कूड़ा न जलाना और जितना हो सके सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना।

निष्कर्ष

दिल्ली का प्रदूषण एक दिन में पैदा हुई समस्या नहीं है और न ही यह एक दिन में खत्म होगी। इसके लिए केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और पड़ोसी राज्यों की सरकारों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर ‘सांसों के अधिकार’ के लिए एक साथ आना होगा। अगर हमने आज कड़े फैसले नहीं लिए, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा शहर सौंपेंगे जहाँ नीला आसमान सिर्फ किस्सों और तस्वीरों में ही देखने को मिलेगा। स्वच्छ हवा एक विलासिता नहीं, बल्कि एक बुनियादी मानवाधिकार है।

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