जेएनयू के नारों से ‘दिल्ली दंगों की साजिश’ तक… आज सुप्रीम कोर्ट तय करेगा ‘मास्टरमाइंड’ आरोपी का भविष्य

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आज, 5 जनवरी, 2026 को देश की सर्वोच्च अदालत में एक ऐसे मामले पर फैसला आने वाला है, जो पिछले कई वर्षों से राष्ट्रवाद बनाम तथाकथित ‘आंदोलनजीवियों’ की बहस का केंद्र बिंदु रहा है। बात हो रही है जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद की। फरवरी 2020 में देश की राजधानी को जिन भयानक सांप्रदायिक दंगों ने झुलसा दिया था, दिल्ली पुलिस के अनुसार, उमर खालिद उस खौफनाक साजिश के प्रमुख ‘मास्टरमाइंड’ में से एक है।

आज सुप्रीम कोर्ट उसकी जमानत याचिका पर अपना फैसला सुनाने वाला है। यह फैसला सिर्फ एक व्यक्ति की आजादी का नहीं, बल्कि इस बात का भी संकेत होगा कि देश की सुरक्षा और संप्रभुता को चुनौती देने वाले गंभीर आरोपों को न्यायपालिका कितनी गंभीरता से लेती है।

इतिहास: जेएनयू से शुरू हुआ ‘भारत विरोधी’ विमर्श का सफर

उमर खालिद का नाम पहली बार राष्ट्रीय पटल पर 2016 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हुई उस कुख्यात घटना के दौरान आया था, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की बरसी पर आयोजित कार्यक्रम में कथित तौर पर “भारत की बर्बादी” के नारे लगे थे।

एक राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से देखें तो, वह घटना महज छात्रों का प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि वह देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों के भीतर पल रही एक जहरीली मानसिकता का प्रकटीकरण थी, जो भारत राज्य (Indian State) के अस्तित्व को ही चुनौती देती थी। उमर खालिद उस ‘टुकड़े-टुकड़े’ विमर्श का एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरा, जिसे राष्ट्रवादियों ने देश की एकता के लिए खतरा माना।

2020 दिल्ली दंगे: विरोध की आड़ में ‘खूनी साजिश’?

साल 2019 में जब सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पारित किया, तो इसके खिलाफ देश भर में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। राष्ट्रवादी खेमे का मानना है कि यह विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक असहमति से कहीं आगे बढ़कर, एक सुनियोजित अराजकता फैलाने का माध्यम बन गया था।

फरवरी 2020 में, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के दौरे पर थे, ठीक उसी समय उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भीषण सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। इन दंगों में 50 से अधिक लोगों की जान गई और सैकड़ों घायल हुए, साथ ही करोड़ों की संपत्ति खाक हो गई।

जेल में क्यों है उमर खालिद? (पुलिस की थ्योरी और UAPA के आरोप)

उमर खालिद को सितंबर 2020 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गिरफ्तार किया था। उस पर और अन्य सह-आरोपियों पर आतंकवाद विरोधी कड़े कानून—गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA)—के तहत मामला दर्ज किया गया।

पुलिस की चार्जशीट और जांच एजेंसियों के दावों के अनुसार, उमर खालिद इन दंगों का सिर्फ एक हिस्सा नहीं था, बल्कि वह इसके प्रमुख षड्यंत्रकारियों (Conspirators) में से एक था।

 उसके खिलाफ मुख्य आरोप ये हैं:

  1. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को बदनाम करने की साजिश: पुलिस का दावा है कि दंगों की समयसीमा (Timing) जानबूझकर अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान तय की गई थी। आरोप है कि उमर खालिद ने अपनी बैठकों में कहा था कि जब ट्रंप भारत में हों, तब सड़कों पर उतरकर ऐसा माहौल बनाया जाए जिससे अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह संदेश जाए कि भारत में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है। राष्ट्रवादियों के लिए, यह देश की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाने का एक देशद्रोहपूर्ण कृत्य था।

  2. अमरावती का भड़काऊ भाषण: फरवरी 2020 में महाराष्ट्र के अमरावती में उमर खालिद द्वारा दिया गया एक भाषण जांच के केंद्र में है। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि इस भाषण में उसने लोगों से सड़कों पर उतरने का आह्वान किया था, जो हिंसा के लिए एक ‘डॉग व्हिसल’ (छिपा हुआ इशारा) था।

  3. ‘चक्का जाम’ और डिजिटल साजिश: जांच एजेंसियों के अनुसार, ‘दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप’ (DPSG) जैसे व्हाट्सएप ग्रुपों के माध्यम से साजिश रची गई। आरोप है कि खालिद ने अन्य आरोपियों (जैसे शरजील इमाम, ताहिर हुसैन) के साथ गुप्त बैठकें कीं, जहाँ ‘चक्का जाम’ को हिंसक दंगों में बदलने की योजना बनाई गई ताकि सरकार को घुटनों पर लाया जा सके।

UAPA क्यों?

राष्ट्रवादी परिप्रेक्ष्य में, दिल्ली दंगे कोई सामान्य कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं थे। यह भारत सरकार के खिलाफ छेड़ा गया एक सुनियोजित युद्ध था। इसलिए, दिल्ली पुलिस द्वारा UAPA जैसी गंभीर धाराओं का इस्तेमाल करना पूरी तरह उचित माना जाता है, क्योंकि इन कृत्यों का उद्देश्य देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा को खतरे में डालना था।

लंबी कानूनी लड़ाई और आज का फैसला

उमर खालिद पिछले तीन साल से अधिक समय से जेल में है। निचली अदालत और दिल्ली उच्च न्यायालय, दोनों ने यह मानते हुए उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी कि प्रथम दृष्टया (prima facie) उसके खिलाफ लगे आरोप सही प्रतीत होते हैं। हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में आरोपों को गंभीर माना था।

हालांकि, उमर खालिद का बचाव पक्ष लगातार यह तर्क देता रहा है कि उसके खिलाफ कोई सीधा सबूत नहीं है और यह केवल असहमति की आवाज़ को दबाने का प्रयास है।

आज, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की पीठ इस लंबी कानूनी गाथा में एक महत्वपूर्ण अध्याय लिखेगी। एक राष्ट्रवादी नागरिक के लिए, यह सिर्फ एक जमानत का मामला नहीं है। यह इस बात का भी परीक्षण है कि क्या वे तत्व, जो कथित तौर पर देश की राजधानी को जलाने की साजिश रचते हैं, कानून के कड़े प्रावधानों का सामना करेंगे, या फिर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की आड़ में उन्हें राहत मिलेगी। पूरे देश की नजरें आज शीर्ष अदालत पर टिकी हैं।

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